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भगवान पार्श्वनाथ जीवन चरित्र भगवान पार्श्वनाथ की बाल्यावस्था नीलकमल सी कान्ती वाले श्री पार्श्वनाथ बाल्यकाल से ही परम मनोहर और तेजस्वी प्रतीत होते थे ।

भगवान पार्श्वनाथ जीवन चरित्र भगवान पार्श्वनाथ की बाल्यावस्था नीलकमल सी कान्ती वाले श्री पार्श्वनाथ बाल्यकाल से ही परम मनोहर और तेजस्वी प्रतीत होते थे ।

उनकी प्रतीभा और बुद्धी कौशल को देखकर महारानी वामा और महाराजा अश्वसेन संतुष्ट थे । तरूणवय समर्थ होते हुए भी आपने राज्य पद स्वीकार नही किया और विवाह करने के इच्छुक नही थे , किन्तु महाराज अश्वसेन के अत्यंत आग्रह पर , पिता कि इच्छानुसार कुशस्थल नगर के महाराजा नरवर्मा कि पुत्री प्रभावती के साथ विवाह किया । भगवान पार्श्वनाथ का समय ईसा पूर्व नवी शताब्दी एवं भगवानमहावीर से दो सौ पचास वर्ष पहले का माना गया है । पार्श्वनाथ भगवान के पूर्वभव 10दस प्रमुख भव इस प्रकार है10 1 मरूभूति का भव 2 हाथी का भव 3 सहस्रार देव 4 किरण देव विद्याधर 5 अच्युत देव 6 वज्रनाभ 7 ग्रैवेयक देव 8 स्वर्णबाहु 9 प्रणत देव 10 पार्श्वनाथ तीर्थंकर गोत्र उपार्जन चक्रवर्ती स्वर्णबाहु के भव मे तीर्थंकर जगन्नाथ के पास दीक्षा ग्रहण कर उग्र तपस्या करते हुए तीर्थंकर गोत्र उपार्जन किया । जन्म काशी (वाराणसी) नरेश अश्वसेनजी की , महारानी वामादेवी कुक्षी से पोष कृष्ण दशमी को मध्यरात्रि के समय विशाखा नक्षत्र मे हुआ । नामकरण जब भगवान गर्भ मे थे ,उस समय अन्धेरी रात्रि मे वामादेवी ने काले सर्प अश्वसेन राजा के पास से जाते हुए देखकर सूचित किया उन्हे प्राण हानी से बचाया ,अतः पिता ने भगवान का नाम पार्श्वकुमार रखा । भगवान पार्श्वनाथ द्धारा नाग का उध्दार एक दिन भगवान राजभवन के झरोखे से नर — नारीयों को पूजा कि सामग्री लिए बडी उमंग से नगर के बाहर जाते देखा सेवक से पता चला नगर के बाहर उपवन मे कमठ तापस पंचाग्नी तप कर रहा है । भगवान अपने अवधि ज्ञान से जाना धुनी मे जो लक्कड़ पड़ा है ,उस मे एक बड़ा नाग जल रहा है । कमठ से कहा धर्म का मूल दया है ,वह आग के जलाने मे किस तरह संभव है ,अग्नी प्रज्वलित करने से जीवो का विनाश होता है । कमठ आग– बबूला हो उठा और धुनी मे कोई जलता हुआ जीव दिखाने को कहा , राजकुमार ने सेवकोसे अग्नीकुंड मे से लक्कड़ निकलवाया और सावधानीपूर्वक उस लक्कड़ को चीरकर जलता हुआ सर्प को बाहर निकाला । तड़पते सर्प को नवकार मंत्र सुनाया और प्रत्याख्यान दिलाकर उसे आर्त्त -रौद्र ध्यान से बचाया । सर्प शुभ भाव से आयू पूर्ण करके धरणेंद्र नाम का इन्द्र हुआ । पार्श्वकुमार के ज्ञान और विवेक की सब लोग मुक्तकंठ से प्रशंसा करनें लगें! भगवान पार्श्वनाथ की दीक्षा 30 वर्ष गृहस्थ जीवन मे रहकर सहज विरक्त हुए , वर्षीदान के उपरान्त पोष कृष्ण एकादशी को तेले की तपस्या से संयम ग्रहण किया । कमठ द्वारा उपसर्ग अज्ञान तप से आयू पूर्ण कर कमठ मेघमाली असुरकुमार देव बना,मेघमाली पूर्वभव के वैर से भगवान पर अनेक उपसर्ग किये । 1 )सिंह ,चीता ,मत्त हाथी ,आशुविष बिच्छु सांप आदि अनेक रुप बनाकर कष्ट दिया । 2 )भयानक वैताल का रूप धारण कर प्रभू को अनेक प्रकार से डराने धमकाने का प्रयास किया । 3) वैक्रिय शक्ती से भयंकर बादलो कि गर्जना कर मूसलधार वर्षा कि ,ओले गिराये ,वर्षा का पानी आपके गर्दन के ऊपर तक पानी आ गया ,धरणेन्द्र का आसन कम्पित हुआ ,प्रभू कि सेवा मे उपस्थित होकर दीर्घनाल युक्त कमल की रचना कर सातफणो कि छत्र से ढक दिया । वीतराग भाव मे पहुंचे भगवान कमठासुर कि उपसर्ग लीला और धरणेन्द्र कि भक्ती, दोनो पर समदृष्टि रहे । भगवान पार्श्वनाथ का केवलज्ञान छद्मस्त काल की 83 रात्रियाँ पूर्ण होने के पश्चात 84 वे दिन (चैत्र कृष्ण चतुर्थी ) वाराणसी के निकट आश्रमपद उद्यान मे ,घातकी वृक्ष के नीचे ,तेले के साथ सम्पूर्ण घाती कर्मो को क्षय कर केवलज्ञान – -केवलदर्शन प्रकट कर लिया ।चातुर्याम धर्म और चतुर्विध संघ का स्थापना कर भावी तीर्थंकर कहलाये ।

सिद्ध बुद्ध मुक्त 70 वर्ष तक भगवान ने देश–देशान्तर मे विचरण किया और जैन धर्म का उपदेश दिया । 100 वर्ष कि आयू पूर्णकर श्रावण शुक्ल अष्टमी को सम्मेदशिखर पर सिद्ध बुद्ध और मुक्त हुए ।

विषेशता कुमार अवस्था – 30, वर्ष राज्य काल —- 0, छद्मस्त काल — 83 दिन ,चारित्र पर्याय — 70, वर्ष
कुल आयु — 100 वर्ष,, गणधर — 8, साधू — 16000, साध्वीया — 38000 ,श्रावक — 1 64 000 ,श्राविका —- 3 27 000, केवली —- 1000, मनः पर्ययज्ञानी — 750 ,अवधिज्ञानी — 1400 14, पूर्वधर —- 350, वैक्रिय लब्द्धीवाले —- 1100,

आगम कें अनुसार कुछ गलत लिखनें में आया हों या काना -मात्रा में कोई गलती हुई हों तों मिच्छामी दुक्कड़म । पार्श्वनाथ प्रभु के दो चमत्कारी मंत्र जपनें से सर्व मनोंकामनाऔ की पुर्ती होती है उनकें रक्षक देवो के द्वारा सम्पूर्ण शान्ती:व सर्व क्लेशों का नाश होता है !
प्रतिदिन जप जरुर किजीएगा!
🙏।।ॐ ह्रीं श्री शंखेश्वरा पार्श्वनाथाय नमो नम: ।।🙏

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