इंदौर के सांवेर विधानसभा में मुख्यमंत्री के कार्यक्रम हेतु 600 बसे अधिग्रहित किए जाने पर उच्च न्यायालय का केन्द्रीय निर्वाचन आयोग,मुख्य सचिव म॰प्र सहित 8 को नोटिस जारी

इंदौर के सांवेर विधानसभा में मुख्यमंत्री के कार्यक्रम हेतु 600 बसे अधिग्रहित किए जाने पर उच्च न्यायालय का केन्द्रीय निर्वाचन आयोग,मुख्य सचिव म॰प्र सहित 8 को नोटिस जारी
 
इंदौर। आगामी विधानसभा उपचुनाव को देखते हुवे पिछले दिनो सांवेर विधानसभा में भाजपा द्वारा सरकारी कार्यक्रम के नाम पर मुख्यमंत्री शिवराज चौहान की सभा कराने के लिए सरकारी खर्च पर 600 बसो का अधिग्रहण कर सरकारी खजाने से डीजल का भुगतान भी किया गया था तथा करोना पोट्रोकाल का उलंघन कर हजारो की संख्या मे भीड़ भी जुटाई गई थी जिस पर युवा कांग्रेस के प्रवक्ता जयेश गुरनानी ने निर्वाचन आयोग को शिकायत की थी तथा संतोषजनक कारवाई नहीं होने पर माननीय उच्च न्यायालय खंडपीठ इंदौर के समक्ष जनहित याचिका प्रस्तुत की थी ।
 
  माननीय उच्च न्यायालय की युगल पीठ द्वारा उक्त याचिका की सुनवाई करते हुवे अधिवक्ता गौरव वर्मा के तर्को से सहमत होते हुवे भारत निर्वाचन आयोग, मध्यप्रदेश निर्वाचन आयोग, मुख्य सचिव मध्यप्रदेश शासन, प्रमुख सचिव सामान्य प्रशासन विभाग, कलेक्टर जिला इंदौर, क्षेत्रीय परिवहन अधिकारी, कार्यपालन यंत्री नर्मदा विकास इंदौर संभाग एवं कार्यपालन यंत्री नर्मदा विकास सनावाद को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है ।
 
 याचिका में मुख्य रूप से उल्लेख किया गया की कोविड-19 महामारी के चलते केंद्र सरकार द्वारा बनाई गई गाईड लाइन अनुसार कार्यक्रम करने हेतु अधिकतम 100 लोगों को इकट्ठा करने की अनुमतिथी परंतु उक्त नियमो का पालन कराने हेतु अधिकृत जिला प्रशासन द्वारा आगामी विधानसभा चुनाव मे भाजपा के लिए सरकारी तंत्रो का दुरुपयोग कर हजारो की भीड़ जुटाने के लिए 600 से अधिक बसों को अधिग्रहण किया गया जिसका औचित्य क्या है?  तथा उक्त अधिग्रहित की गई बसो का किराया तथा पेट्रोल डीजल की खरीदी का पैसा सरकारी खजाने से क्यों दिया गया ? तमाम सरकारी निर्देशो के बाद भी कोविड-19 महामारी के चलते हजारों की संख्या में भीड़ जुटाकर मध्य प्रदेश ग्वालियर खंडपीठ के आदेश की अवमानना क्यों की गई ?मुख्यमंत्री जैसे जवाबदार लोकसेवक मध्य प्रदेश की जनता को कोरोना वायरस की महामारी  की विभीषिका में क्यों झोका गया ?

गौरतलब है कि आपदा प्रबंधन अधिनियम की धारा 56 के तहत यदि कोई सरकारी अधिकारी केंद्र सरकार अथवा राज्य सरकार के निर्देशों का पालन नहीं करता है तो जवाबदार अधिकारी को 1 वर्ष के कठोर कारावास की सजा हो सकती है।
 

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