बेईमानी में भी ईमानदारी का आभास दिलाने का कुचक्र -अन्ना दुराई

*बेईमानी में भी ईमानदारी का आभास दिलाने का कुचक्र !*

*-अन्ना दुराई*

लगता है आजकल बड़े से बड़े घोटाले भी मात्र हंसी मजाक का विषय बनकर रह गए हैं। जहां देखो, लीपापोती के अलावा कुछ नहीं। कारस्तानियों के पक्ष में तर्क ऐसे ऐसे कि आँख शर्म से झुक जाए। अर्सा हो गया, बढ़ती महंगाई को राष्ट्रहित के आवरण में ढक कर उसे जायज ठहराने का काम बखूबी होता रहा लेकिन अब चोरी, डाके और भ्रष्टाचार को लेकर भी सबकुछ सामान्य बताने का काम शुरू हो गया है। क्या हो गया, चलता है, इतनी बेशर्मी से फैलाया जा रहा है कि भोले भाले आम नागरिकों को बेईमानी में भी ईमानदारी का आभास होने लगता है। यहां तक कि अब धर्म के नाम पर हो रहे अधर्म को सहन करने की सीख दी जाती है। आँखों के सामने हो रहा है, साफ साफ दिखाई दे रहा है लेकिन लाचार और बेबस सा आम आदमी मौन के सिवाय कुछ धारण नहीं कर पाता।

जहां तक आम आदमी का सवाल है, उनकी चुप्पी और निरसता का एक कारण और भी नजर आता है। अपनी दाल रोटी की जुगत में जैसे तैसे आम आदमी अपना दिन काटता है। रात उसकी कल का सपना देखते हुए कटती है। इससे उभरे तो शासन प्रशासन द्वारा जब तब धर या घेर लिया जाता है। वर्तमान परिदृश्य को इस प्रचलित कहानी से समझा जा सकता है। दो मित्र राजा थे। एक सदैव अपनी प्रजा की चिंता में तो दूसरा सिर्फ अपने में मगन। पहले को बीमारियों ने घेर लिया, दूसरा मद मस्त। दोनों मिले तो दूसरे ने पहले राजा को समझाया, राज्य की जनता पर इतने कर, नियम कायदे लाद दो कि वो इससे उबर न पाए। हमेशा उसे रोजमर्रा की आवश्यकताओं की पूर्ति में इतना व्यस्त रखो कि वह दीन दुनिया की सोच ही न पाए।

वास्तव में यही हाल है। छोटे व्यापारी हो या सर्विस पेशा, परिवार का पालन पोषण इतना दुष्कर होता जा रहा है कि उसका उन बातों तक तो ध्यान ही नहीं जा पाता जिसका वास्तविकता में देश से लेना देना है। आजीविका चलाने की कोशिश में बड़ी से बड़ी लापरवाही, कारगुजारियों, घटना दुर्घटना पर भी उसका खून नहीं खौलता। न वह आक्रोशित नजर आता है। बस इसीलिए हर कोई बेखौफ है। चार दिन में सब भूल जाने का इंतजार भी नहीं करते। रोज कोई न कोई मामला सामने आता है और रफा दफ़ा भी हो जाता है।

और तो और अनियमितता सत्ता पक्ष या उनसे जुड़े समर्थकों, संगठनों की हो तो कानून अपना काम करेगा वाली पंक्ति थोथी साबित होने लगती है। ढील इतनी कि जो चाहे कर लो। कार्रवाई होना जाना नहीं। भ्रष्टाचार को शिष्टाचार बताने की यह कवायद आने वाले समय में देश के लिए खतरनाक ही साबित होगी। पक्ष हो या विपक्ष सभी को इसे गंभीरता से समझना होगा। राजनीति जनसेवा का माध्यम बनें न कि स्वसेवा का, इसके लिए कमर तो कसना ही होगी। नेता नगरी को राम नाम जपना, पराया माल अपना वाले मुहावरे को चरितार्थ करने से बचना होगा।

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