*पुराने रिश्तों की मिठास और अपनों की याद*
✒️ *अक्षय जैन*
पुराने रिश्तों की एक अलग ही मिठास होती है।
वह केवल परिचय नहीं होते, बल्कि वर्षों की आत्मीयता, अपनत्व और संवेदनाओं से बुनी हुई ऐसी डोर होते हैं, जो समय के साथ और मजबूत होती चली जाती है।
आज अचानक श्वेतांबर स्थानवासी समाज इंदौर के वरिष्ठ समाजसेवी श्री महेंद्र झेलावत जी का फोन आया। उन्होंने मेरे पूज्य पिताजी स्व. शांतिलाल जी मारू के साथ रहकर समाज सेवा महावीर भवन स्वाध्याय की सहभागिता करते रहे हैं। कभी साधु-संतों की व्यावच्च में समर्पित रहने वाले, समाज के जुलूसों में अपनी बुलंद आवाज से गगनभेदी नारों द्वारा जनमानस में रोमांच भर देने वाले महेंद्र जी आज अस्वस्थता के दौर से गुजर रहे हैं।
बीमारी की अवस्था में उन्होंने मुझे याद किया, यह केवल एक फोन कॉल नहीं था, बल्कि पुराने रिश्तों की उस जीवंत अनुभूति का स्पर्श था, जिसने मन को भावुक कर दिया।
सच तो यह है कि 80 के दशक के लोग रिश्तों के मामले में दुनिया के सबसे *“रिश्तधनी”* लोग थे।
उनके पास शायद आज जैसी भौतिक संपन्नता नहीं थी, लेकिन दिलों में अपनापन, संवेदनाएं और रिश्तों को निभाने की अद्भुत समृद्धि थी।
वे लोग सुख-दुख में साथ खड़े रहने को ही सबसे बड़ी पूंजी मानते थे।
*आज का दौर बदल चुका है।*
अब रिश्तों में आत्मीयता कम और दौलत, व्यक्तित्व के आडंबर तथा स्वार्थ का प्रभाव अधिक दिखाई देता है।
लोग साथ तो हैं, लेकिन दिलों की दूरियां बढ़ती जा रही हैं।
ऐसे समय में पुराने लोग ही हमें यह एहसास कराते हैं कि रिश्तों की असली ताकत दिखावे में नहीं, बल्कि याद करने, हाल पूछने और कठिन समय में साथ खड़े रहने में होती है।
*महेंद्र झेलावत जी का यह फोन मुझे फिर से* *याद दिला गया कि*
*पुराने रिश्ते कभी बूढ़े नहीं होते..*
वे बस समय के किसी मोड़ पर फिर से दस्तक देकर आंखों को नम और दिल को भावुक कर जाते हैं।
— अक्षय जैन (मारू)






