उज्ज्वला’ तले अंधेरा ! -धीरेंद्र राय

`उज्ज्वला’ तले अंधेरा !

-धीरेंद्र राय

ये कहने में गुरेज नहीं होना चाहिए कि ईरान और इजरायल-यूएस के बीच हो रही गोलीबारी में मिसाइलें हमारे LPG सिलेंडर पर भी गिर रही हैं. आज भारत में एलपीजी की डिमांड जिस तेजी से बढ़ी है, उसने हमारी ऊर्जा सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.

साल 2016 में जब `प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना` शुरू हुई थी, तो इसे एक क्रांतिकारी कदम माना गया था. ग्रामीण महिलाओं को चूल्हे के धुएं से मुक्ति दिलाना एक बड़ा मानवीय और स्वास्थ्य संबंधी टारगेट था. सिलेंडर घर-घर पहुंचे, चूल्हे जले और करोड़ों भारतीयों की जीवनशैली बदल गई. लेकिन आज, करीब दस साल बाद, इसी सफलता ने भारत को एक ऐसी मुश्किल स्थिति में लाकर खड़ा कर दिया है, जिसे `सक्सेस ट्रैप` कहा जा सकता है. ईरान और इजरायल के बीच बढ़ते तनाव और रेड सी (लाल सागर) में जारी हलचल ने भारत की एक कड़वी हकीकत से रूबरू कर दिया है. हकीकत यह है कि हमने चूल्हे तो घर-घर पहुंचा दिए, लेकिन उन चूल्हों को जलाने के लिए जरूरी गैस के लिए हम दुनिया के सबसे अशांत कोने पर निर्भर हो गए. आज भारत में एलपीजी की डिमांड जिस तेजी से बढ़ी है, उसने हमारी ऊर्जा सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. LPG डिमांड ग्रोथ से यह भी हकीकत सामने आ गई है कि उज्ज्वला योजना के जरिए दिए गए सिलेंडर रीफिल न करवाने की बातें प्रोपोगेंडा ही थीं. आंकड़े गवाह हैं कि उज्ज्वला योजना के बाद भारत में एलपीजी की खपत में जबरदस्त उछाल आया. गांव-गांव तक गैस सिलेंडर की पहुंच ने इसे एक अनिवार्य वस्तु बना दिया. लेकिन समस्या यहीं से शुरू हुई. भारत में एलपीजी का उत्पादन उस रफ्तार से नहीं बढ़ा, जिस रफ्तार से उसकी मांग बढ़ी. परिणाम यह हुआ कि भारत को अपनी कुल एलपीजी जरूरत का करीब 55 से 60 प्रतिशत हिस्सा विदेशों से आयात करना पड़ रहा है. अकेले उज्ज्वला योजना ने भारत के आयात बिल को कई गुना बढ़ा दिया. आज भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा एलपीजी उपभोक्ता और आयातक बन चुका है. हमारी यह बढ़ती प्यास मुख्य रूप से पश्चिम एशिया के देशों, खासकर कतर, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात से बुझती है. भारत की एलपीजी इंपोर्ट सप्लाई का 90 फीसदी हिस्सा `स्ट्रेट ऑफ होर्मुज` से होकर गुजरता है. ईरान बनाम इजरायल-अमेरिका युद्ध की वजह से यह गैस लाइफलाइन कट सी गई है. नतीजा युद्ध के संकट ने भारत की धड़कनें बढ़ा दी हैं. अगर यह रास्ता लंबे समय बंद रहता है या टैंकरों पर हमले होते रहते हैं, तो भारत के करोड़ों घरों के चूल्हे ठंडे पड़ सकते हैं. यही वजह है कि भारत आज एक लाचार स्थिति में है. हमें अपनी डिप्लोमेसी का पूरा जोर इस बात पर लगाना पड़ रहा है कि युद्ध के मैदान में हमारे टैंकर सुरक्षित रहें. खबरों के मुताबिक, भारत ने ईरान से संपर्क साधा है कि वह होर्मुज स्ट्रेट से निकलने वाले भारतीय टैंकरों को निशाना न बनाए. हालांकि, यह स्थिति सुखद नहीं है कि भारत को अपनी रसोई बचाने के लिए दूसरे देशों के सामने गुहार लगानी पड़े. किसी भी देश के लिए आपात स्थिति से निपटने के लिए `स्ट्रेटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व` यानी तेल और गैस का भंडार होना जरूरी है. लेकिन भारत में एलपीजी स्टोरेज की क्षमता बेहद कम रही है. हमारी वर्तमान स्टोरेज कैपेसिटी डिमांड के मुकाबले नगण्य है. अगर सप्लाई चेन में 10-15 दिन की भी रुकावट आती है, तो देश में हाहाकार मच सकता है. दशकों से हमने पाइपलाइनों और सिलेंडरों के डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम पर तो ध्यान दिया, लेकिन `बैकअप प्लान` पर काम नहीं किया. अब जब पानी सिर के ऊपर से गुजर रहा है, तब सरकार ने रिफाइनरियों को एलपीजी उत्पादन बढ़ाने और स्टोरेज स्टॉक को युद्धस्तर पर दुरुस्त करने के निर्देश दिए हैं. लेकिन क्या यह काफी है? भारी-भरकम इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा करने में सालों लगते हैं, जबकि संकट दरवाजे पर खड़ा है. सोशल मीडिया पर एलपीजी की कमी और बढ़ती कीमतों को लेकर अफवाहों और डर की बाढ़ आ गई है. सरकार बार-बार भरोसा दिला रही है कि देश में गैस की कोई कमी नहीं है और स्टॉक पर्याप्त है. लेकिन हकीकत यह है कि जनता अब केवल आश्वासनों पर भरोसा नहीं करती. पेट्रोलियम और नेचुरल गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने संसद में ईरान युद्ध के कारण ईंधन संकट को लेकर विस्तृत बयान दिया. और फिर अपने बयान की कॉपी X पर पोस्ट करते हुए एक मैसेज लिखा. जिसमें पेट्रोल-डीजल सप्लाय को लेकर तो बेफिक्र रहने की बात कही गई. लेकिन, LPG सप्लाय को लेकर उनकी बातों में ठहराव रहा. उन्होंने सरकार की तैयारियों का जिक्र तो किया, लेकिन अंत में यह भी लिखा कि यह एक चैलेंज है, और हमें इसका मिलकर सामना करना है. देर से ही सही, अब सरकार को समझ आ रहा है कि केवल एलपीजी के भरोसे रहना आत्मघाती हो सकता है. इसीलिए अब घरेलू सोलर प्लांट और `सोलर कुकिंग` को तेजी से बढ़ावा दिया जा रहा है. सरकार चाहती है कि लोग एलपीजी से अपनी निर्भरता कम करें और सौर ऊर्जा को अपनाएं. यह कदम सही दिशा में है, लेकिन क्या करोड़ों ग्रामीण परिवार जो अभी-अभी लकड़ी से एलपीजी पर शिफ्ट हुए हैं, इतनी जल्दी सोलर कुकर अपना पाएंगे? यह एक बड़ा सवाल है. उज्ज्वला योजना ने बेशक करोड़ों महिलाओं को धुआं मुक्त जीवन दिया, लेकिन इसने अनजाने में भारत को अंतरराष्ट्रीय तेल राजनीति की बिसात पर एक कमजोर मोहरा भी बना दिया. आज की स्थिति एक चेतावनी है. एक बड़ी आबादी वाला देश केवल आयातित ईंधन के भरोसे अपनी रसोई नहीं चला सकता. ईरान-इजरायल युद्ध ने हमारी आंखें खोल दी हैं. यह वक्त केवल डिप्लोमेसी से काम चलाने का नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर बनने का है. वरना, वैश्विक राजनीति के हर उबाल के साथ भारत की रसोई का तापमान भी बढ़ता रहेगा. हमें यह समझना होगा कि ऊर्जा सुरक्षा ही राष्ट्र की असली सुरक्षा है.

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