*विवाह की बदलती उम्र एक चिंता का पहलू*।
समाज में समय के साथ अनेक परिवर्तन हुए हैं लेकिन एक ऐसा बदलाव जो हमारे परिवारों और समाज की संरचना को गहराइयों से प्रभावित कर रहा है…. विवाह की उम्र में लगातार हो रही देरी। पहले परिवार के वीडिल अपने रहते पोते पड़पोते सुख की अभिलाषा करते रहे ओर उन्हें यह सुख प्राप्त होता रहा लेकिन अब आधुनिकता का दौर पढ़े लिखने का जुनून फिर बेहतर जॉब पोजिशन की तलाश दर तलाश के क्रम की वजह से विवाह में देरी एक बड़ी वजह बना रहा है….। आजकल लड़कियां भी जॉब करना या जॉब वाले लड़के पसंद करने के चक्कर में गृहस्थी जीवन आचरण मानसिकता से दूर हो रही है। उन्हें अपनी पसंद के मुताबिक शनिवार रविवार होटल पब और विलासिता के सुख देने वाले की चाह अब विवाह की पहली प्राथमिकता के पायदान पर आंकलन की जाने की वजह भी विवाह की देरी का कारण बन रहा है।
अमूमन जॉब के वजह से लड़की को माता पिता बुजुर्ग या संयुक्त परिवार अब अड़चन लगने वाला कारण भी विवाह में देरी का मुख्य कारण बन रहा है …. बिजनेसमैंन परिवार में लड़की विवाह नहीं करने की इच्छा पाल लेती है , व्यवसायिक समृद्ध परिवार के बच्चों को हेय दृष्टि का दर्जा देकर रिफ्यूज किया जाता है। जबकि पहले समाजिक स्तर पर खानदान , उनकी व्यवसायिक पृष्ठभूमि ओर धर्म प्रवृति आधारित आंकलन विवाह रिश्तों की बुनियाद होते थे लेकिन आजकल लड़के का पैकेज का आंकलन किया जाता है मेट्रो सिटी ओर मेट्रो कल्चर को कसौटी मानने की वजह विवाह में देरी का बड़ा कारण हो गया है?
*रिश्तों की गहराई ओर उनका महत्व*
आजकल माता पिता बच्चों के निर्णय के सामने स्वत: ही नतमस्तक हो रहे हैं। चूंकि युवा बच्चे पढ़ लिख कर अपने फैसले खुद करने पर आमदा हो जाते है और परिवार की बुनियाद के विपरीत अपनी निजता को ज्यादा अहमियत देने की वजह से रिश्तों की गहराइयों ओर उनका महत्व के प्रभाव से दूर हो रहे हे। पुश्तैनी पारंपरिकता निर्णय को वह बदले जमाने में अछूत बता देते हैं। पूरे भारत वर्ष में जैन समाज सबसे संस्कारी समाज का दर्जा , धर्म प्रभाव ओर व्यवसायिक समृद्धि के तौर पर अंकित होता था लेकिन आजकल इसी समाज में।विकृतियां इतनी पनप रही है बच्चे अपनी पसंद को तरजीह देने की जिद्द में रहते हैं , जिसके चलते विवाह के लिए अंतरजातीय विवाह के रास्ते पर जा रहे हैं।
*अंत में*
विवाह केवल जीवन के एक चरण के रूप में नहीं बल्कि इसे समाज -परिवार की स्थिरता के लिए अनिवार्य पहलू के रूप में समझना होगा। युवाओं को भौतिक सुख के साथ साथ पारिवारिक ओर समाजिक जिम्मेदारियों का बौद्ध का महत्व समझना होगा । विवाह ओर परिवार के निर्माण में पुश्तैनी पारिवारिक पृष्ठभूमि के बीज अंकुरित रखना होगे।
आलेख – *✒️ अक्षय जैन (नाकोड़ा)*






