*भय दिखाकर सुरक्षा बेच रहे हैं नेता !*
*-अन्ना दुराई*
कभी कभी सोचता हूँ शांति और सुकून भरे सुशासन का दावा करने वाली सरकारें सत्ता में आने के बाद विपरीत व्यवहार क्यों करने लगती है। कई तरह के उद्योग व्यापार में भय दिखाकर अपना माल बेचने का हूनर आम रूप से दिखता है। ऐसे में भयमुक्त शासन का दावा करने वाली सरकारें भी जब डर और आतंक को अपना हथियार बना लेती है तो स्थिति बद से बदतर होना स्वाभाविक ही है। समझ नहीं आता कि शांति और सद्भाव की बात करें तो ये नेता अशांत क्यों हो जाते हैं। भय और आतंक की राजनीति पर प्रहार तो होना ही चाहिए। जनता बहुत भोली होती है। अंधविश्वास और अफवाह फैलाने वाले मैसेजों तक पर वो भरोसा कर लेती है। विभिन्न माध्यमों से मिलने वाली झूठी खबरों को भी सच मान लेती है। ऐसे में सरकार में बैठे नुमाइंदों ने अपनी राजनीति चमकाने के लिए जो इंसानियत को खत्म करने वाले काम शुरू किए हैं, पता नहीं हमारे देश, प्रदेश और शहर को न जाने किस हाल में ले जाकर छोड़ेंगे। जहां सद्भाव की बात करना देश द्रोह की श्रेणी में ला खड़ा किया जाए, वहां शांति और सुकून की सोच बेमानी होगी। आज नेता जनता को भय दिखाकर सुरक्षा बेच रहे हैं। उनके हर आचार विचार में भय और आतंक की राजनीति साफ दिखती है लेकिन ऐसे में हमारे प्रशासन की भूमिका तो और भी संदिग्ध नजर आती है। अर्थ का अनर्थ हो रहा हो, लेकिन प्रशासन को कई मामलों में गलती नजर नहीं आती। प्रशासनिक अधिकारी आँखों पर पट्टी बांध लेते हैं और मुंह पर मौन का आवरण ओढ़ लेते हैं।
चौराहे चौराहे चेकिंग के नाम पर आम जनता को कंपकंपा देने वाले पुलिस प्रशासन के हाथ पांव शांति और सद्भाव बिगाड़ने वाले तत्वों पर कार्रवाई करने के नाम पर क्यों फूल जाते हैं। दिन भर सोशल मीडिया पर हिन्दू मुस्लिम एंगल के झूठे और भड़काऊ मैसेज चलते हैं लेकिन ऐसे मैसेजों को अमृत तुल्य मानना जनमानस की मजबूरी हो जाती है। हर मोड़ पर पुलिस प्रशासन के घमंड और अहंकार का सामना आम जनता करती है, अपनी गुजर बसर के छोटे मोटे कामों के लिए याचक की मुद्रा में सिर झुकाए खड़ी रहती है लेकिन बात सत्ताधीशों की हो तो प्रशासन की नरमी देखते ही बनती है। नेता हो या प्रशासन, सभी का पहला कर्तव्य अपने नागरिकों को भयमुक्त और गर्वयुक्त जीवन जीने का हक प्रदान करने का होना चाहिए।
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