बनाया भी आपने और बोल भी आप ही रहे हैं !
-अन्ना दुराई
वाकई अपने सिर आँखों पर बिठाए नेताओं के मुँह से जब जनता के लिए कड़वे शब्द निकलते हैं तो हैरानी नहीं होती। जनता को भिखारी बनाया भी आपने और अब भिखारी बोल भी आप ही रहे हैं। दूसरे देशों की तरक्की की क्या बात करें। धर्म के नाम पर रोज रोज के झगड़े फसाद से वे कोसों दूर हैं। वहाँ निजी आस्था के साथ अपने आराध्य का स्मरण किया जाता है। वहाँ धर्म के नाम पर जोर जबरदस्ती कहीं दिखाई नहीं देती। कर्म को ही धर्म माना जाता है इसीलिए सभी लगन और परिश्रम से धन अर्जन करते हैं। मेहनती हैं इसलिए कभी किसी का मुँह नहीं ताकना पड़ता। लेकिन हमारा देश उल्टी राह पर प्रतीत होता है। यहाँ आम नागरिकों का दिन हिन्दू मुस्लिम में गुजरता है। व्यर्थ की बहस में उलझाकर दिन के दिन बिगाड़ दिया जाता है। खबर पल भर की नहीं और आने वाले सौ दौसो साल की बात होती है। व्यक्ति भोजन भंडारे से ही ऊपर नहीं उठ पाता। हम चायना जैसे देशों की कामयाबी से जलते हैं। फर्क यही है कि वहाँ काम की पूजा होती है। लेकिन यहाँ आम नागरिक को अकर्मण्यता की ओर ढकेला जा रहा है। एक बार मुफ्तखोरी की आदत लग जाए तो अच्छे अच्छों से काम नहीं होता। जनता को चाले भी नेताओं ने ही लगाया है। वोट के लिए फ्री की योजनाएँ देकर अपने ही हित साधे जा रहे हैं। पता नहीं नेताओं के दिलो दिमाग़ से जनता की इतनी जबरदस्त सेवा का भूत कब उतरेगा। ये सेवा का जजबा है या स्वयं के मेवे के प्रति ललक, जनता जानती सब है लेकिन फिर भी वाह वाही करती है।
मुफ्त की योजनाएँ जनता को नाकारा तो बनाती ही है, नेताओं और अधिकारियों के लिए भ्रष्टाचार का साधन भी बनती है। कोरोना को गए करीब 5 वर्ष हो गए लेकिन आज भी देश की 80 करोड़ जनता को मुफ्त राशन बांटा जाता है। भारत तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया। विश्व गुरू बनने ही वाला है परन्तु 80 करोड़ जनता को मुफ्त का राशन बांटने का सिलसिला जस का तस है। लगता है सबकी सोचने समझने की शक्ति ही मानों चली गई हो। एक ओर मुफ्त चिकित्सा का दावा किया जाता है तो दूसरी ओर स्वास्थ्य बीमा सहित सभी तरह के इंश्योरेंस पर 18 प्र.श. जीएसटी वसूला जाता है। जनता की मूलभूत सुविधाएँ जैसे रोटी, कपड़ा और मकान को लेकर मुफ्त के दावे जरूर होते रहते हैं लेकिन बेरोज़गारी दूर करने के उपायों पर चर्चा नहीं होती। देश की तरक्की के लिए जनता को सक्षम बनाने की बजाय उन्हें लाचार बनाने की श्रेणी में लाया जाता है। अब तो पगार की तरह सरकारें हर महीने रूपए भी बाँटने लगी है। राज्यों के मुख्यमंत्री घोषणाएँ तो ऐसे करते हैं मानो अपनी जेब से पैसे दे रहे हों। पक्ष एक हज़ार की घोषणा करता है तो विपक्ष दो हजार की। जनसेवा की ऐसी ललक देखकर हैरानी होती है। कहने से तात्पर्य यह है कि नेता ही अपनी जनता को भिखारी बना रहे हैं। देश की असली तरक्की जनता को मुफ्तखोर बनाने में नहीं बल्कि उनको लायक बनाने में है। उन्हें कामचोर नहीं बल्कि कामकाजी बनाना होगा। आम नागरिकों की भलाई भी इसी में है।
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