40 अफसरों के भरोसे हैं 3000 मामलों की जांच, सालों करना होता है इंतजार

40 अफसरों के भरोसे हैं 3000 मामलों की जांच, सालों करना होता है इंतजार

भोपाल | राज्य आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो (ईओडब्ल्यू) में वर्तमान एक दर्जन से अधिक आर्थिक अनियमितताओं के मामलों की जांच जारी है। ईओडब्ल्यू में दर्ज अपराध, शिकायतें, प्राथमिक शिकायतें और संदेहास्पद लेन-देन के 3000 से ज्यादा मामलों की जांच के लिए मात्र 235 अधिकारियों-कर्मचारियों का स्टाफ ही उपलब्ध है, जबकि स्वीकृत पदों की संख्या 275 है। ऐसे में इन मामलों की जांच के लिए मौजूदा बल ऊंट के मुंह में जीरा साबित हो रहा है। ईओडब्ल्यू में जांच के लिए अफसरों की संख्या बढ़ाने की कवायद कई बार हो चुकी है, मगर अब तक इस दिशा में सरकार की तरफ से कोई पहल नहीं हो सकी है। राज्य सरकार के निर्देश पर ईओडब्ल्यू में अपराध तो दर्ज कर लिया जाता है, लेकिन इसकी जांच की समय-सीमा तय नहीं। इसके उदाहरण भाजपा सरकार में हुए एक दर्जन से अधिक आर्थिक घोटालों में मामले शामिल हैं। इसमें 75 हजार से अधिक का ई-टेंडरिंग घोटाला, 300 करोड़ का स्मार्ट सिटी टेंडर घोटाला, एमसीयू जैसे गंभीर मामले शामिल हैं।
ईओडब्ल्यू की सात संभागीय इकाइयां भोपाल, इंदौरी, उज्जैन, ग्वालियर, सागर, जबलपुर तथा रीवा में कार्यरत है। इनके अधीनस्थ 52 जिले आते हैं। प्रदेश में लगातार बढ़ रहे भ्रष्टाचार के मामलों में आय से अधिक संपत्ति, पद का दुरुपयोग, अफसरों का संदेहास्पद लेन-देन जैसे मामलों की यहां होने वाली शिकायतों की संख्या वर्तमान में 2000 है। एक शिकायत की जांच में एक सप्ताह लगता है। इस तरह एक अधिकारी एक साल में सिर्फ 50 शिकायतों की जांच कर सकता है। अगर 40 अधिकारियों ने इनकी जांच कराई जाए तो एक साल का समय लगेगा। ब्यूरो में वर्तमान में मात्र डीएमपी और निरीक्षक ही उपलब्ध हंै। अगर इन अधिकारियों से रजिस्टर्ड शिकायतों की जांच कराई जाए तो फिर रेग्युलर दर्ज 500 केस, 300 प्राथमिकों जांच और 200 संदेहास्पद लेन-देने की जांच के लिए कोई अधिकारी नहीं है। सूत्रों का कहना है कि ब्यूरो में जिस शिकायतों की हर साल संख्या बढ़ रही है, उस अनुपात में करीब पंाच सौ निरीक्षक डीएसपी उपलब्ध होना चाहिए, क्योंकि आपराध, शिकायतों की जांच का जिम्मा इन्हीं अधिकारियों को रहा है। एसपी, एआईजी, एडीजी के पास तो प्रकरणों की मॉनिटरिंग का काम रहता है। उप निरीक्षकों को गंभीर मामलों की जांच नहीं दी जाती है। उन्हें जमीन पर अवैध कब्जा, भू-खंड खरीदी के नाम पर धोखाधड़ी, अड़ीबाजी जैसे मामलों की शिकायतों की जांच दी जाती है। प्रधान आरक्षक और आरक्षक का काम समंस, वारंटों की तालीमी का रहता है।
इन गंभीर मामलों की चल रही जांच
> ई-टेंडरिंग का 75 हजार से ज्यादा घोटाला
> 300 करोड़ का स्मार्ट सिटी टेंडर घोटाला
> स्वास्थ्य विभाग 40 करोड़ का दवा खरीदी घोटाला
> सिंहस्थ में 1500 करोड़ का खरीदी घोटाला।
> रोहित गृह निर्माण संस्था में 23 करोड़ का फर्जीवाड़ा
> एमसीयू में स्टडी सेंटर समेत आधा दर्जन मामले
> भोज विवि में नियुक्ति, खरीदी में भ्रष्टाचार की शिकायत।
> सीहोर स्वास्थ्य विभाग का 31 करोड़ का दवा घोटाला।
यह है प्रकरणों की स्थिति
> रजिस्टर्ड शिकायतें -2000
> रजिस्टर्ड अपराध- 500
> प्राथमिक शिकायतें -300
> संदेहास्पद लेन-देन-200
जांच अधिकारियों का टोटा
एजेंसी में घपले-घाटालों की जांच का जिम्मा विवेचक अफसर डीएसपी और निरीक्षक पर रहता है। यहां डीएसपी के 22 पद स्वीकृत है, जबकि उपलब्ध मात्र 13 है। इसी तरह निरीक्षक के 43 में 27 ही उपलब्ध है। एसआई के 38 में 36 ही उपलब्ध है।
यहां डीएसपी-निरीक्षक नहीं सिर्फ एसपी
ब्यूरो की सागर में खोली गई संभागीय इकाई में तो निरीक्षक ओर डीएसपी ही नहीं है। यहां एसपी, कुछ उप निरीक्षक और निचले स्तर का प्रधान आरक्षक और आरक्षक ही उपलब्ध है। ऐसे में यहां दर्ज होने वाली रजिस्टर्ड शिकायतों, संदेहास्पद के मामलों की जांच जबलपुर संभागीय इकाई को भेजी जाती है। जांच अधिकारी उपलब्ध नहीं होने से यह इकाई नाममात्र की भूमिका में है।

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