*विकास का अधूरा सपना और जिम्मेदारी का सवाल*
_इंदौर शहर की पहचान साफ-सुथरी सड़कों, अनुशासित यातायात और तेज रफ्तार विकास से जुड़ी रही है। बीते वर्षों में शहर को नई ऊंचाइयों पर ले जाने के लिए कई महत्वाकांक्षी परियोजनाओं की घोषणा हुई , कहीं फ्लाईओवर बन रहे हैं, कहीं मेट्रो का नेटवर्क खड़ा किया जा रहा है, और कहीं राष्ट्रीय राजमार्गों का विस्तार हो रहा है। इन परियोजनाओं का उद्देश्य साफ था कि इंदौर को और बेहतर बनाना, नागरिकों को सुगम और सुरक्षित आवागमन देना।_
_लेकिन हालात यह हैं कि इन योजनाओं के अधूरे और असंगठित क्रियान्वयन ने नागरिकों की परेशानियां बढ़ा दी हैं। निर्माणाधीन फ्लाईओवरों के आसपास की सड़कों पर गड्ढे ऐसे हैं मानो वहां विकास नहीं, विनाश हो रहा हो। वैकल्पिक मार्गों की स्थिति इतनी बदतर है कि लोगों के लिए इन पर चलना किसी जोखिम से कम नहीं। नतीजा यह कि आए दिन हादसे हो रहे हैं और लोग असुविधा झेल रहे हैं। सवाल यह है कि जब विकास कार्य चल रहे थे, तब जनता की सुरक्षा और सुविधा को लेकर समानांतर तैयारी क्यों नहीं की गई?_
_महापौर पुष्यमित्र भार्गव ने हाल ही में इस मुद्दे को लेकर एक पत्र लिखा है, जिसमें उन्होंने निर्माण एजेंसियों को कड़े शब्दों में सचेत किया है। उनका कहना है कि पूर्व में भी मध्यप्रदेश रोड डेवलपमेंट कॉरपोरेशन, इंदौर विकास प्राधिकरण, मेट्रो विभाग और राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण जैसी संस्थाओं को स्पष्ट निर्देश दिए गए थे कि काम जारी रखते हुए वैकल्पिक मार्ग और सर्विस रोड दुरुस्त रखे जाएं, ताकि जनता को असुविधा न हो और दुर्घटनाओं पर रोक लगे। लेकिन इन निर्देशों का पालन नहीं हुआ।_
_यह पत्र दर्शाता है कि शहर के विकास में समन्वय की कितनी बड़ी कमी है। अलग-अलग विभाग अपने-अपने दायरे में काम कर रहे हैं, पर नागरिकों की पीड़ा के प्रति उनकी जवाबदेही धुंधली पड़ गई है। जनता को तो यह फर्क नहीं पता कि किस परियोजना के पीछे कौन-सा विभाग है। उनके लिए विकास का हर काम “नगर निगम” के नाम से जुड़ जाता है। ऐसे में निगम को अनावश्यक आलोचना झेलनी पड़ती है, जबकि वास्तविक जिम्मेदारी निर्माण एजेंसियों की होती है।_
_यह स्थिति स्पष्ट करती है कि शहर के विकास कार्यों में पारदर्शिता और जवाबदेही कितनी जरूरी है। अगर जनता को हर निर्माण कार्य की समयसीमा, जिम्मेदार विभाग और वैकल्पिक व्यवस्थाओं की जानकारी समय पर मिले, तो असंतोष कम होगा। पर दुर्भाग्य यह है कि अक्सर जानकारी छिपाई जाती है और परिणामस्वरूप असंतोष बढ़ता है।_
_महापौर का यह पत्र महज नाराजगी का इजहार नहीं है, बल्कि यह एक चेतावनी भी है कि विकास के नाम पर जनता की परेशानी अनदेखी नहीं की जा सकती। आने वाले समय में यह जरूरी है कि नगर निगम, राज्य सरकार और सभी निर्माण एजेंसियां मिलकर एक साझा रोडमैप तैयार करें। इसमें यह तय हो कि किस विभाग की क्या जिम्मेदारी होगी और जनता को क्या सुविधाएं मिलेंगी।_
_इंदौर का विकास केवल पुल और सड़कें बनाने से नहीं होगा। असली विकास वह होगा जिसमें नागरिकों की सुरक्षा, सुविधा और संतोष को केंद्र में रखा जाए। अगर विकास की राह में लोगों का धैर्य और विश्वास लगातार टूटता रहा, तो ये बड़े-बड़े प्रोजेक्ट अधूरे सपनों की तरह रह जाएंगे।_
_महापौर की चिट्ठी शहर के विकास पर एक आईना है.. जो दिखाता है कि इमारतें ऊंची जरूर हो रही हैं, लेकिन व्यवस्था की नींव अभी भी कमजोर है। अब समय है कि इस नींव को मजबूत किया जाए, वरना विकास के ये स्मारक नागरिकों की नाराजगी की कहानियां ही बनकर रह जाएंगे।_
अभिषेक मिश्रा
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